बाल-कहानी-II

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मगर और सियार 

एक थी नदी। उसमें एक मगर रहता था। एक बार गरमियों में नदी का पानी बिलकुल सूख गया। पानी की एक बूंद भी न बची। मगर की जान निकलने लगी। वह न हिल-डुल सकता था और न चल ही सकता था।
नदी से दूर एक पोखरा था। पोखरे में थोड़ा पानी था, लेकिन मगर वहां जाये कैसे? तभी उधर से एक किसान निकला। मगर ने कहा, “ओ, किसान भैया! मुझे कहीं पानी में पहुंचा दो। भगवान तुम्हारा भला करेगा।”
किसान बोला, “पहुंचा तो दूं, पर पानी में पहुंचा देने के बाद तुम मुझे पकड़ तो नहीं लोगे?”
मगर ने कहा, “नहीं, मैं तुमको कैसे पकड़ूगा?”
किसान ने मगर को उठा लिया। वह उसे पोखरे के पास ले गया,
और फिर उसको पानी में छोड़ दिया। पानी में पहुंचते ही मगर पानी पीने लगा। किसान खड़ा-खड़ा देखता रहा। तभी मगर ने मुड़कर किसान का पैर पकड़ लिया।
किसान बोला, “तुमने कहा था कि तुम मुझको नहीं खाओगे? अब तुमने तुझको क्यों पकड़ा है?”
मगर ने कहा, “सुनो, मैं तो तुमको नहीं पकड़ता, लेकिन मुझे इतनी जबरदस्त भूख लगी है कि अगर मैंने तुमको न खाया, तो मर जाऊंगा। इससे तो तुम्हारी सारी मेहनत ही बेमतलब हो जायगी? मैं तो आठ दिन का भूखा हूं।”
मगर ने किसान का पैर पानी में खींचना शुरू किया।
किसान बोला, “ज़रा ठहरो। हम किसी से इसका न्याय करा लें।”
मगर ने सोचा—‘अच्छी बात है, थोड़ी देर के लिए यह तमाशा भी देख लें। उसने किसान का पैर मजबूती के साथ पकड़ लिया और कहा, “हां, पूछ लो। जिससे भी चाहो, उससे पूछ लो।”
उधर से एक बूढ़ी गाय निकली। किसान ने उसकी सारी बात सुनाई और पूछा, “बहन! तुम्हीं कहा, यह मगर मुझको खाना चाहता है। क्या इसका यह काम ठीक कहा जायगा?”
गाय ने कहा, “मगर! खा लो तुम इस किसान को। इसकी तो जात ही बुरी है। जबतक हम दूध देते हैं, ये लोग हमें पालते हैं। जब हम बूढ़े हो जाते हैं, तो हमको बाहर निकाल देते हैं। क्यों भई किसान! मैं ठीक कह रही हूं न?” मगर किसान के पैर को ज़ोर से खींचने लगा।
किसान बोला, “ज़रा ठहरो। हम और किसी से पूछ देखें।” वहां एक लंगड़ा घोड़ा चर रहा था।
किसान ने घोड़े को सारी बात सुना दी और पूछा, “कहो, भैया,क्या यह अच्छा है?”
घोड़े ने कहा, “मेहरबान! अच्छा नहीं, तो क्या बुरा है? जरा मेरी तरफ देखिए। मेरे मालिक ने इतने सालों तक मुझसे काम लिया और जब मैं लंकड़ा हो गया, तो मुझे घर से बाहर निकाल दिया? आदमी की तो जात ही ऐसी है। मगर भैया! तुम इसे खुशी-खुशी खा जाओ!”
मगर किसान के पैर को जोर-जोर से खींचने लगा। किसान ने कहा, “ज़रा ठहरो। अब एक किसी और से पूछ लें। फिर तुम मुझको खा लेना।”
उसी समय उधर से एक सियार निकला। किसान ने कहा, “सियार भैया! ज़रा हमारे इस झगड़े का फैसला तो कर जाओ।”
सियारन ने दूर से ही पूछा, “क्या झगड़ा है भाई?”
किसान ने सारी बात कह दी। सियार फौरन समझ गया कि मगर किसान को खा जाना चाहता है। सियार ने पूछा, “तो किसान भैया, तुम वहां उस सूखी जगह में पड़े थे?”
मगर बोला, “नहीं, वहां तो मैं पड़ा था।”
सियार ने कहा, “समझा-समझा,तुम पड़े थे। मैं तो ठीक से समझ नहीं पाया था। अच्छा, तो फिर क्या हुआ?”
किसान ने बात आगे बढ़ाई। सियार बोला, “भैया, क्या करूं? मेरी अकल काम नहीं कर रही है। मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूं। सारी बात एक बार फिर समझाकर कहा। हां, तो आगे क्या हुआ?”
मगर चिढ़कर बोला, “सुनो, मैं कहता हूं। यह देखो, मैं वहां पड़ा था।”
सियार अपना सिर खुजलाते-खुलजाते बोला, “कहां? किस तरह?” मगर ताव में आ गया। उसने किसान का पैर छोड़ दिया और वह दिखाने लगा कि वहां, किस तरह पड़ा हुआ था।
सियार ने फौरन ही किसान को इशारा किया कि भाग जाओ! किसान
भागा। भागते-भागते सियार ने कहा, “मगर भैया! अब मैं समझ गया कि तुम कहां, किस तरह पड़े थे। अब तुम बताओ कि बाद में क्या हुआ?”
मगर छटपटाता हुआ पड़ा रहा गया और सियार पर दांत पीसने लगा। वह मन-ही-मन बोला, “कभी मौका मिला, तो मैं इस सियार की चालबाजी को देख लूंगा। आज इसने मुझे ठग लिया है।
कुछ दिनों के बाद चौमासा शुरू हुआ। नदी में जोरों की बाढ़ आई। मगर नदी में जाकर रहने लगा। एक दिन सियार नदी पर पानी पीने आ रहा था। मगर ने उसे दूर से देख लिया। मगर किनारे पर पहुंचा और छिपकर दलदल में बैठ गया। न हिला, न डुला। सिर्फ अपनी दो आंखें खुली रखीं। सियार ने मगर की आंखें देख लीं। वह वहां से कुछ दूर जाकर खड़ा रहा और हंसकर बोला:
नदी-नाले के दल-दल को दो आंखें मिलीं।
नदी-नाले के दल-दल को दो आंखें मिलीं।
सुनकर मगर ने एक आंख मींच ली। आंखें मटकाते हुए सियार ने कहा:
नदी-नाले के दलदल की एक आंख वची।
नदी-नाले के दलदल की एक आंख बची।
सुनकर मगर ने दोनों आंखें मींच लीं। सियार बोला: ओह् हो!
नदी-नाले के दलदल की दोनों आंख भी गईं।
नदी नाले के दलदल की दोनों आंखें भी गईं।
मगर समझ गया कि सियार ने उसको पहचान लिया है।
उसने कहा, “कोई बात नहीं। आगे कभी देखेंगे।”
बहुत दिन बोत गए। सियार कहीं मिला नहीं।
एक बार बहुत पास पहुंचकर सियार नदी में पानी पी रहा था। तभी सपाटे के साथ मगर उसके पास पहुंचा और उसने सियार की टांग पकड़ ली।
सियार ने सोचा—‘अब तो बेमौत मर जाऊंगा। इस मगर के शिकंजे में फंस गया।’
लेकिन वह ज़रा भी घबराया नहीं। उलटे, ज़ोर से ठहाका मारकर हंसा और बोला, “अरे भैया! मेरा पैर पकड़ो न? पुल का यह खम्भा किसलिए पकड़ लिया है।? मेरा पैर तो यह रहा।” मगर न महसूस किया कि सचमूच उससे भूल हो गई। उसने फौरन ही सियार का पैर छोड़ दिया खम्भे को कचकचाकर पकड़ लिया।
पैर छूटते ही सियार भागा। भागते-भागते सियार ने कहा, “मगर भैया, वह मेरा पैर नहीं है। वह तो खम्भा है। देखो मेरा पैर तो यह रहा!”
फिर सियार ने उस नदी पर पानी पीना बन्द कर दिया। मगर ने बहुत राह देखी। दिन-रात पहरा दिया। पर सियार नदी पर क्यों आने लगा? अब क्या किया जाये?
नदी-किनारे एक अमराई थी। वहां सियार अपने साथियों को लेकर रोज आम खाने पहुंचता था। मगर ने सोचा कि अब मैं अमराई में जाकर छिपूं। एक दिन वह डाल पर पके आमों के बड़े-से ढेर में छिपकर बैठा। सियार को आता देखकर उसने अपनी दोनों आखें खुली रखीं।
हमेशा की तरह सियार अपने साथियों को लेकर अमराई में पहुंचा। फौरन ही उसकी निगाह दो आंखों पर पड़ीं उसने चिल्लाकर कहा, “भाईयों, सुना! यह बड़ा ढेर सरकार का है। इसके पास कोई जाना मत। सब इस दूसरे ढेर के आम खाना।”
इस बात भी सियार पकड़ में नहीं आया। मगर ने सोचा कि अब तो मैं इस सियार की गुफा में ही जाकर बैठ जाऊं। वहां तो यह पकड़ में आ ही जायगा।
एक बार सियार को बाहर जाते देखकर मगर उसकी गुफा में जा बैठा। सारी रात जंगल में घूमने-भटकने के बाद जब सबेरा होने को आया, तो सियार
अपनी गुफा में लौटा। गुफा में घुसते ही उसने वहां मगर की दो आंखें देखीं। सियार ने कहा, “वाह-वाह, आज तो मेरे घर में दो दीए जल रहे हैं।” मगर ने अपनी एक आंख बन्द कर ली। सियार बोला, “अरे रे, एक दीया बुझ गया।” मगर ने अपनी दोनों आंखें बन्द कर लीं।
सियार ने कहा, “वाह, अब तो दोनों ही दीये बुझ गए। अब इस अंधेरी गुफा में कौन जाय! किसी दूसरी गुफा में चला जाऊं।” सियार चला गया। आख़िर मगर उकताकर उठा और वापस नदी में पहुंच गया।
सियार फिर कभी मगर की पकड़ में नहीं आया।

मुर्ख कौआ 

एक था तोता। बड़ा भला और समझदार था। एक दिन तोते से उसकी मां ने कहा, ‘‘भैया! अब तुम कहीं कमाने जाओ।’’
‘‘ठीक’’, कहकर तोता कमाने निकला। चलते-चलते बहुत दूर पहुंच गया। वहां एक बहुत बड़ा सरोवर था। सरोवर की पाल पर आम का एक पेड़ था। तोता उस पेड़ पर बैठ गया।
आम के पेड़ पर बहुत-से कच्चे और पके आम लगे थे। तोता आम खाता, आम की डाल पर झूलता और अपनी बोली में बोलता। इसी बीच उधर से एक ग्वाला निकला। तोते ने ग्वाले से कहा:
ओ भैया, गायों के ग्वाले,
ओ भाई, गायों के ग्वाले!
मेरी मां से कहना,
तोता भूखा नहीं है,
प्यासा नहीं है,
आम की डाल पर,
सरोवर की पाल पर,
कच्चे आम खाता है,
पक्के आम खाता है,
मौज उड़ाता है।ग्वाले ने कहा, ‘‘भैया! अपनी इन गायों को छोड़कर मैं तुम्हारी मां से कहने कहां जाऊं? तुम्हें जरुरत हो, तो इनमें से एक बढ़िया गाय तुम ले लो।’’ तोते ने एक गाय रख ली और आम के तने से बांध दी।
कुछ देर बाद उधर से एक और ग्वाला निकला। उसके पास भैंसे थीं। तोते ने अपनी मां को उसके द्वारा संदेश भिजवाना चाहा, पर ग्वाले ने कहा, ‘‘भैया! मैं तो तुम्हारा यह संदेश पहुंचा नहीं सकूंगा। तुमको जरुरत हो, तो इनमें से एक भैस ले लो।’’ तोते ने एक अच्छी-सी भैंस रख ली और आम के तने से बांध दी।
थोड़ी देर के बाद उधर से बकरियों को हांकता एक ग्वाला निकला। तोते ने बकरियों के ग्वाले से वही कहा, पर वह ग्वाला माना नहीं। उसने कहा, ‘‘भैया! अपनी इन बकरियों को छोड़कर मैं तुम्हारी मां से कहने कैसे जा सकता हूं? तुमको जरुरत हो तो इनमें से दो-चार बकरियां ले लो।’’ तोते ने दो-चार बकरियां रख लीं और उनको आम के तने से बांध दिया।
बाद में उधर से भेड़ों को लेकर एक ग्वाला निकला।
तोते ने उससे भी कहा कि वह उसकी मां को उसकी कुशलता का समाचार दे दे, लेकिन वह बोला, ‘‘अरे भैया! अपनी इन भेड़ों को छोड़कर मैं तुम्हारी मां से कहने कैसे जा सकता हूं? तुमको जरुरत हो, तो चार-पांच भेड़ें रख लो।’’ तोते ने चार-पांच भेड़ें रख लीं और उनको आम के तने से बांध दिया।
बाद में उधर से घोड़ों का, हाथियों और ऊंटों का रखवाला निकला। घोड़ो के रखवाले ने तोते को एक घोड़ा दिया, हाथियों के रखवाले ने एक हाथी दिया और ऊंटों के रखवाले ने एक ऊंट दिया।
इसके बाद तोता गाय, भैस, बकरी, भेड़, घोड़ा, हाथी और ऊंट, इन सबको लेकर एक बड़े शहर में पहुंचा। वहां उसने इन सबको बेच दिया। बेचने से तोते को बहुत-से रुपए मिल गये। कुछ रुपयों से उसने सोना खरीदना, चांदी खरीदी और गहने बनवा लिए। गहने उसने नाक में, कान में और चोंच में पहन लिये। बचे हुए रुपयों को अपने पंखों में और अपनी चोंच में रख लिया। बाद में वह अपने घर की तरफ रवाना हुआ। घर पहुंचते-पहुंचते बहुत रात हो गई। घर के सब लोग सो चुके थे। तोते ने सांकल खटखटाई और मां को पुकारा:मां, मां!
दरवाजा खोलो,
दरवाजा खोला,
बिछायन बिछवाओ,
खटिया लगवाओ,
शहनाई बजवाओ,
तोता पंख झाड़ेगा,
मां ने सोचा कि तोता इतनी रात बीते कैसे आ सकता है? यह तो कोई चोर होगा और झूठ बोल रहा होगा। मां ने दरवाजा नहीं खोला। तोता अपनी काकी के घर पहुंचा। वही बात उसने काकी से कही, पर काकी ने भी दरवाजा नहीं खोला। फिर वह बहन के यहां और बुआ के यहां गया। वहां भी वैसा ही हुआ।
तोता अपने कई रिश्तेदारों के घर गया, पर किसी ने दरवाजा नहीं खोला। इसके बाद तोता अपनी दादी के घर पहुंचा। पहुंचकर उसने दादी मां को पुकारा:
दादी मां, दादी मां,
दरवाजा खोलो,
दरवाजा खोलो,
बिछायन बिछवाओ।
खटिया लगवाओ,
शहनाई बजवाओ,
तोता पंख झाड़ेगा।
दादी ने तोते की आवाज पहचान ली। उसने कहा, ‘‘बेटे मेरे! ज़रा ठहरो। मैं आती हूं। अभी दरवाजा खोलती हूं।’’ दादी ने दरवाजा खोला और घर के अन्दर पहुंचकर तोते ने दादी के पैर छुए। दादी मां ने तोते को आशीर्वाद दिया।
बाद में दादी ने तोते के लिए बिछायन बिछाई, खटिया लगाई और उस पर बढ़िया मुलायम गादी बिछाई। फिर दादी ने कहा, ‘‘बेटे! तुम यहीं बैठो। मैं अभी शहनाई वाले को बुलाकर लाती हूं।’’ दादी शहनाई वाले को बुला लाई और शहनाई बजने लगी।
तोता खुश हो गया और वह अपने पंखों और चोंच से रुपए झाड़ने लगा। खननन, खननन की आवाज के साथ रुपए झड़ने लगे। ढेर लग गया। कुछ ही देर में सारे घर के अन्दर रुपए-ही-रुपए हो गए।
सबेरा हुआ। सबको पता चला कि तोता कमाई करके आया है और बहुत-सारे रुपए लायो है। पड़ोस में एक कौवी रहती थी। उसे मालूम हुआ कि तोता बड़ी कमाई करके लाया है, तो उसने अपने लड़के कौए से कहा, ‘‘बेटा! तुम भी कमाने जाओ।’’
कौआ कमाने निकला। लेकिन कौआ तो आखिर कौआ ही था। उसे घूरे और घूरों की गन्दगी अच्छी लगती थी। इसलिए वह घूरे पर पहुंचा और अपने पंखों में, चोंच में और कान में तरह-तरह की गन्दी चीजें भर लीं। जब रात हुई, तो कौआ घर लौटा और तोते की तरह दरवाजे की सांकल खटखटाते हुए बोला:
मां, मां!
दरवाजा खोलो,
दरवाजा खोला,
बिछायन बिछवाओ,
खटिया लगवाओ,
शहनाई बजवाओ,
कौआ पंख झाड़ेगा।
मां बेचारी झटपट उठीं उसने दरवाजा खोला। बिछायन बिछाई खटिया लगाई और शहनाई बजवाई। जब शहनाई बजने लगी, तो कौए ने अपने पंख झाड़ने शुरु किए और सारे घर में गन्दगी-ही-गन्दगी हो गई। बदबू का कोई हिसाब नहीं रहा। कौए की मां को इतना गुस्सा आ गया कि उसने कौए को घर के बाहर निकाल दिया।

हंस और कौआ 

एक सरोबर था, समन्दर जैसा बड़ा। उसके किनारे बरगद का एक बहुत बड़ा पेड़ था। उस पर एक कौआ रहता था।

कौआ तो काजल की तरह काला था, काना था और लंगड़ा था। कौआ कांव-कांव बोला करता था। जब वह उड़ता था, तो लगता था कि अब गिरा, अब गिरा। फिर भी उसके घमण्ड की तो कोई सीमा नहीं थी। वह मानता था कि उसकी तरह तो कोई उड़ही नहीं सकता, न कोई उसकी तरह बोल ही सकता है। कौआ लाल-बुझक्कड़ बनकर बैठता और सब कौओं को डराता रहता।

एक बार वहां कुछ हंस आए। आकर बरगद पर रात भर रहे। सबेरा होने पर कौए ने हंसों को देखा। कौआ गहरे सोच में पड़ गया—‘भला ये कौन होंगे? ये नए प्राणी कहां के हैं?” कौए ने अपनी जिन्दगी में हंस कभी देखे होते तो वह उनको पहचान पाता? उसने अपना एक पंख घुमाया, एक टांग उठाई और रौब-भरी आवाज़ में पूछा, “आप सब कौन हैं? यहां क्यों आए हैं? बिना पूछे यहां क्यों बैठे हैं?”

हंस ने कहा, “भैया! हम हंस हैं। घूमते-फिरते यहां आ गए हैं। थोड़ा आराम करने के बाद आगे बढ़ जायेंगे।”

कौआ बोला, “सो तो मैंने सब जान लिया, लेकिन अब यह बताओ कि आप कुछ उड़ना भी जानते हैं या नहीं? या अपना शरीर योंही इतना बड़ा बना लिया है।”

हंस ने कहा, “हां, हां उड़ना तो जानते हैं, और काफी उड़ भी लेते हैं।”

कौए ने पूछा, “आप कौन-कौन-सी उड़ानें जानते हैं? अपने राम को तो इक्कावन उड़ाने आती हैं।”

हंस ने कहा, “इक्कावन तो नहीं, लेकिन एकाध उड़ान हम भी उड़ लेते हैं।”

कौआ बोला, “ओहो, एक ही उड़ान! अरे, इसमें कौन-सी बड़ी बात है?”

हंस ने कहा, “हम तो बस इतना ही जानते हैं।”

कौआ बोला, “कौए की बराबरी कभी किसी ने की है? कहां इक्कावन, और कहां एक? कौआ तो कौआ है ही, और हंस हंस हैं!”

हंस सुनते रहे। वे मन-ही-मन हंसते भी रहे। लेकिन उन हंसों में एक नौजवान हंस भी था। उसके रहा नहीं गया। उसका खून उबल उठा। वह बोला, “कौए भैया! अब तो हद हो गई। बेकार की बकवास क्यों करते हो? आओ हम कुछ दूर उड़ लें। लेकिन पहले तुम हमें अपनी इक्कावन उड़ानें तो दिखा दो! फिर हम भी देखेंगे, और हमें पता चलेगा कि कैसे कौआ, कौआ है, और हंस, हंस हैं।”

हंस बोला, “लो देखो।”

हंस ने कहा, “दिखाओ।”

कौए ने अपनी उड़ाने दिखाना शुरू किया। एक मिनट के लिए वह ऊपर उड़ा और बोला, “यह हुई एक उड़ान।” फिर नीचे आया और बोला, “यह दूसरी उड़ान।” फिर पत्ते-पत्ते पर उड़कर बैठा और बोला , “यह तीसरी उड़ान।” बाद में एक पैर से दाहिनी तरफ उड़ा और बोला, “यह चौथी उड़ान।” फिर बाईं तरफ उड़ा और बोला, “यह पांचवीं उड़ान।”

कौआ अपनी ऐसी उड़ानें दिखाता गया। पांच, सात, पन्द्रह बीस, पच्चीस, पचास और इक्कावन उड़ानें उसने दिखा दीं। हंस तो टकटकी लगाकर देखते और मन-ही-मन हंसते रहे।

इक्कावन उड़ानें पूरी करने के बाद कौआ मस्कराते-मुस्कराते आया और बोला, “कहिए, कैसी रही ये उड़ानें!

हंसो ने कहा, “उड़ानें तो ग़जब की थीं! लेकिन अब आप हमारी भी एक उड़ान देखेंगे न ?”

कौआ बोला, “अरे, एक उड़ान को क्या देखना है! यों पंख फड़फड़ाए, और यों कुछ उड़ लिए, इसमें भला देखना क्या है?”

हंसों ने कहा, “बात तो ठीक है, लेकिन इस एक ही उड़ान में हमारे साथ कुछ दूर उड़ाना हो, तो चली। उड़कर देख लो। ज़रा। तुम्हें पता तो चलेगा कि यह एक उड़ाने भी कैसी होती है?”

कौआ बोला, “चलो, मैं तो तैयार हूं। इसमें कौन, कोई शेर मारना है।”

हंस ने कहा, “लेकिन आपको साथ ही में रहना होगा। आप साथ रहेंगे, तभी तो अच्छी तरह देख सकेंगे न?”

कौआ बोला, “साथ की क्या बात है? मैं तो आगे उड़ूंगा। आप और क्या चाहते हैं?”

इतना कहकर कौए ने फटाफट पंख फड़फड़ाए और उड़ना शुरू कर दिया। बिलकुल धीरे-धीरे पंख फड़फड़ाता हुआ हंस भी पीछे-पीछे उड़ता रहा। इस बीच कौआ पीछे को मुड़ा और बोला, “कहिए! आपकी यही एक उड़ान है न? या और कुछ दिखाना बाक़ी है?”

हंस ने कहा, “भैया, थोड़े उड़ते चलो, उड़ते चला, अभी आपको पता चल जायगा।”

कौआ बोला, “हंस भैया! आप पीछे-पीछे क्यों आ रहे हैं? इत्

धीमी चाल से क्यों उड़ रहे हैं? लगता है, आप उड़ने में बहुत ही कच्चे हैं!”

हंस ने कहा, “ज़रा उड़ते रहिए। धीरे-धीरे उड़ना ही ठीक है।”

कौए के पैरों में अभी जोर बाक़ी था। कौआ आगे-आगे और हंस पीछे-पीछे उड़ रहा था।

कौआ बोला, “कहो, भैया! यही उड़ान दिखानी थी न? चलो, अब हम लौट चलें। तुम चलें। तुम थक गए होगे। इस उड़ान में कोई दम नहीं है।”

हंस ने कहा, “ज़रा आगे तो उड़िए। अभी उड़ान दिखाना तो बाक़ी है।”

कौआ आगे उड़ने लगा। लेकिन अब वह थक चुका था। अब तक आगे था, पर अब पीछे रह गया।

हंस ने पूछा, “कौए भैया! पीछे क्यों रह गए! उड़ान तो अभी बाक़ी ही है।”

कौआ बोला, “तुम उड़ते चलो, मैं देखता आ रहा हूं और उड़ भी रहा हूं।” लेकिन कौए भैया अब ढीले पड़ते जा रहे थे। उनमें अब उड़ने की ताक़त नहीं रही थी। उसके पंख अब पानी छूने लगे थे।

हंस ने पूछा, “कौए भैया! कहिए, पानी को चोंच छूआकर उड़ने का यह कौन-सा तरीका है?”

कौआ क्या जवाब देता? हंस आगे उड़ता चला, ओर कौआ पीछे रहकर पानी में डूबकियां खाने लगा।

हंस ने कहा, “कौए भैया! अभी मेरी उड़ान तो देखनी बाकी है। आप थक कैसे गए?”

पानी पीते-पीते भी कौआ आगे उड़ने की कोशिश कर रहा था। कुछ दूर और उड़ने के बाद वह पानी में गिर पड़ा।

हंस ने पूछा, “कौए भैया! आपकी यह कौन-सी उड़ान है? बावनवीं या तिरपनवीं?”

लेकिन कौआ तो पानी में डुबकियां खाने लगा था और आखिरी सांस

लेने की तैयारी कर रहा था। हंस को दया आ गई। वह फुरती से कौए के पास पहुंचा और कौए को पानी में से निकालकर अपनी पीठ पर बैठा लिया। फिर उसे लेकर ऊपर आसमान की ओर उड़ चला।

कौआ बोला, “ओ भैया! यह तुम क्या कर रहे हो? मुझे तो चक्कर आ रहे हैं। तुम कहां जा रहे हो? नीचे उतरो, नीचे उतरो।”

कौआ थर-थर कांप रहा था।

हंस ने कहा, “अरे जरा देखो तो सही! मैं तुमको अपनी यह एक उड़ान दिखा रहा हूं।”

सुनकर कौआ खिसिया गया। उसको अपनी बेवकूफी का पता चल गया। वह गिड़गिड़ाने लगा। यह देखकर हंस नीचे उतरा औरा कौए को बरगद की डाल पर बैठ दिया। तब कौए को लगा कि हां, अब वह जी गया।

लेकिन उस दिन से कौआ समझ गया कि उसकी बिसात कितनी है।

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