बाल-कहानी-I

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चतुर नाई

एक था नाई। वह बड़ी समझवाला आदमी था। एक बार नाई दूसरे गांव जाने के लिए निकला। साथ में हजामत बनाने की पेटी भी थी।

रास्ते में एक बहुत बड़ा और घना जंगल पड़ा। नाई अपने रास्ते चला जा रहा था कि इसी बीच उसे एक बाघ आता दिखाई पड़ा। नाई घबराउठा।

सोचा- ‘अब तो बेमौत मरे! यह बाघ मुझे क्यों छोड़ने लगा?’

इसी बीच नाई को एक तरकीब सूझी। जैसे ही बाघ पास आया, नाई गरजकर बोला, “आ जा कुत्ते ! अब तेरी क्या ताक़त है कि तू मेरे हाथसे छूट-कर भाग सके। देख, इस एक बाघ की तो मैंने अन्दर बन्द किया ही है, और अब तेरी बारी है।” नाई ने बाघ को कुत्ता कहा था,इसलिए बाघ तो आग-बबूला हो उठा था। वह छलांग मारकर नाई पर झपटा। तभी नाई ने आईना निकलकर बाघ को दिखाया। बाघ ने उसमे अपना मुंह देखा।

उसने सोचा-‘सचमुच इस नाई की बात तो सही मालूम होती है। एक बाघ तो पकड़ा हुआ दीख ही रहा है। अब यह मुझे भी पकड़ लेगा।’फिर तो बाघ इतना डरा कि वहां से जान लेकर भागा।

नाई ने आईना अपनी पेटी मे रख लिया और वह आगे बढ़ा। चलते- चलते रात हो गई। नाई एक बड़े से बरगद पर जा बैठा और रात वहीं रहगया।हजामत की पेटी उसने एक डाल पर टांग दी, और वह आराम से बैठ गया। कुछ ही देर के बाद बरगद के नीचे बाघ इकट्ठे होने लगे।एक, दो तीन चार इस तरह कई बाघ जमा हो गए।

आज वहां बाघों को अपना वन-भोजन था। उन बहुत से बाघों में वह बाघ बोला, “अरे भैया! आज तो गज़ब हो गया!”

सब बाघ पूछने लगें, “क्या हुआ?”

बाघ बोला, “आज एक नाई मुझे रास्ते में मिला। जब मैं उस पर झपटा और उसे खाने दौड़ा तो, वह बोला, ‘अरे कुत्ते! एक को तो मैंने बन्दकिया ही है, अब तेरी बारी है। तू भी आ जा।’ जैसे ही मैं उसे खाने दौड़ा,उसने अपनी पेटी में से एक बाघ निकाला और मुझे दिखाया। मैं तोइतना डर गया कि पूंछ उठाकर भाग खड़ा हुआ।”

एक बाघ ने कहा, ” बस करो, बस करो, बेमतलब की गप मत हांको। भला, कोई नाई किसी बाघ को इस तरह पकड़ सकता है?”

बाघ बोला, ” अरे भैया! मैंने तो उसे अपनी आंखों से देखा है।”

दूसरे बाघ ने कहा, “ऊहं! तुम तो डरपोक हो, इसलिए डरकर भाग खड़े हुए। तुम्हारी जगह मैं होता,तो उसे वहीं खत्म कर देता।”

बाघों को बातें सुनकर नाई तो पसीना-पसीना हो गया। वह इस तरह थर-थर कांपने लगा कि बरगद की डालियां हिल उठीं. एक डाल परएक बंदर सो रहा था। डाल के हिलने पर वह नीचे आ गिरा। तभी नाई ने होशियारी से काम लेकर कहा, “भैया, पकड़ लो उसे बाघ को।ख़बरदार, छोड़ना मत! यह बाघ बहुत सयाना बन रहा है।”

सुनकर बाघ ने कहा, ” देखों, मैं कहता था न कि कोई बाघों को पकड़ने निकला है?”

संयोग कुछ ऐसा हुआ कि बंदर उस बाघ पर ही आ गिरा । बाघ तो छलांगे मारता हुआ भाग निकला। उसके पीछे-पीछे दूसरे सब बाघ भीभागे। सब-के सब बाघ गायब हो गये।

सबेरा होने पर नाई आराम के साथ बरगद से नीचे उतरा और अपने घर पहुंच गया।

रत्ना भाई

गढ़वी भारणिया नाम का एक छोटा-सा गांव थां उस गांव में सात-आठ घर राजा परिवार से जुड़े भाइयों और भतीजों के थे। ये सब ‘भायात’ कहलाते थें जो भी पैदावार होती, सो खा-पी लेते और पड़े रहते। उनके बीच एक गए़वी रहते थे। नाम था, रलाभाई। पर रलाभाई की किसी से कभी पटती नहीं थी। रलाभाई मुंहफट थे। कोई उनसे कुछ कहता, तो वे फौरन ही उलटकर सवाल पूछते और सामनेवाले को चूप कर दिया करते।
भायातों के पास भैसें बहुत थीं। पर रलाभाई के पास एक भी भैस नहीं थी। हां, एक भैंसा जरुर था। वह बड़े डील-डौल वाला था। भैसे के गले में एक घण्टी बंधी रहती थी। जब भैंसा चलता, तो घण्टी टन-टन-टन बजती रहती। जब रोज़ सुबह भायातों की भैसें चरने को निकलतीं, तो उनके पीछे-पीछे रलाभाई भी अपने भैंसे के साथ निकल पड़ते और कहते:
टन-टन घण्टी बजती है,
रला का भैसा चरने जाता है।
होते-होते कई दिन बीत गए। गांव के लोगों को लगा कि ये सारी भैसें रलाभाई की होंगी, इसीलिए वे कहते हैं:टन-टन घण्टी बजती है,
रला का भैंसा चरने जाता है।
जब भायातों को इसका पता चला, तो वे नाराज हो गये। सब कहने लगें, “लो, देखा, यह स्वयं इतनी भैसों का मालिक बन गया है! इसकी अपनी तो एक बांडी भैंसे भी नहीं है। फिर यह क्यों कहता है:टन-टम घण्टी बजती है,
रला के ढोर चरने जाते है।
इसका तो अपना एक बड़ा भैंसा ही है। भैंसे के गले में इसने एक घण्टी बांध रखी है। बस, इतने में ही यह बहक गया-सा लगता है। अच्छा है, किसी दिन इसे भी समझ लेंगे।”,
मौका पाकर भायातों ने रलाभाई के भैंसे को मार डाला। सबने कहा, “बला टली!”
रलाभाई बड़े घाघ थे। वे इस बात को पी गए। मन ही मन बोले, ‘ठीक है, कभी मौक़ा मिलेगा, तो मैं देख लूंगा।‘,
रलाभाई ने भैंसे की पूरी खाल चमार से उतरवा ली। खाल की सफाई करवा लेने के बाद उन्होंने उसकी तह काट ली और सिर पर उठाकर चल पड़े।
चलते-चलते एक घने जंगल में पहुंचे। वहां बरगद का एक पेड़ था। उसका नाम था, चोर बरगद।सब चोर जब भी चोरी जब भी चोरी करके आते, तो इसी बरगद के नीचे बैठकर चोरी के माल का बंटवारा किया करते। रलाभाई बरगद पर चढ़कर ‘बैठ गए। डाल पर चमड़ा टांग दिया।
जब रात के दो बजे, तो चोऱ वहां पहुंचे। किसी नगर सेठ की हेवली में सेंध लगाकर और बड़ी चोरी करके वे वहां आए थे। चोर चोरी के माला का बंटवारा करने बैठे। एक चोर नपे कहा, ” सुनों भैया, कोई अपने पास का माल दबाकर रखेगा, तो उस ऊपर से आसमान टूट पड़ेगा”
बंटवारा करते सयम एक चोर ने पीछे कोई चीज़ छिपाई। रलाभाई नेइसे देख लिया। उनहोंने ऊपर से चमड़ा फेका, जो कड़कड़ाता हुआ नीचे गिरा।
चारे बोले, “भागो रे, भागो! यह तोक कड़कड़ाती हुई बिजली गिरी है।”
चोर डर गए और भाग खड़े हुए। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तक नहीं। बाद में बड़े आराम के साथ रलाभाई नीचे उतरे और सारी माया लेकर अपने घर पहुंचे।
अपने झोंपडे का दरवाजा बन्द करके रलाभाई रुपए गिनने बैठे। वे सुनकर पास-पड़ोस के लोग कहने लगे, “अरे, इपन रलभाई के पास तो एक कानी कौड़ी तक नहीं थी अब ये इतने बड़े पैसे वाले कैसे बन गए?”,
सबने पूछा, “रलाभाई! इतनी बड़ी कमाई आप कहां से कर लाये?”
रलाभाई ने कहा, “मैंने अपने भैंसे का चमड़ा जो बेचा, उसी के ये दाम मिले हैं। ओहो, उधर चमड़े की कितनी मांग है! बस, कूछ पूछिए मत। मेरा तो एक ही भैंसा था। उसके मुश्किल से इतने रुपए मिले हैं। अगर कई भैंसे होते, तो एक लाख रूपय मिल जाते ।”
भायातों को पता चला। उन्होंने कहा, “तो आओ हम भी चलें, और रलाभाई की रतह कमाई करके लायें।” भायातों ने अपनी सब भैंसें मार डालीं। उनकी खालें उतरवाई। खालों की सफाई करवाई, और सिर पर खालें रखकर बेचने चले ।
लेकिन इतनी सारी खालें कौन खीरदता? मुश्किल से चार-छह खालें बिकीं और दस-पन्द्रह रूपए मिले। खालों के लाख रूपये कौन देने बैठा था!
शाम हुई और भायात सब इकट्ठे हुए। सबने कहा, “अरे, इन रलाभाई ने तो हम सबकों ठग लिया है! ठीक हैं, कभी देखेंगे।”
कुछ दिनों के बाद भायातों ने इकट्ठे होकर रलाभाई का झोपड़ा जला डाला। रलाभाई बोले, ” अच्छी बात है। आप लोगों ने मेरा तो झोंपड़ा ही
जलाया है, लेकिन मैं आप सबके घर न जलवा दूं, तो मेरा नाम रला गढ़वी नहीं।”
रलाभाई ने झोपड़े की राख एक थैले में इकट्ठी की। एक लद्दू बैल पर राख का थैला लादा और पालीनाना जा रहे यात्रियों के एक संघ के साथ रलाभाई भी जुड गए। संघ मे एक बूढ़ी मांजी थीं। बेचारी चल नहीं पाती थी।
मांजी के पास बहुत-सा धन था। रलाभाई के लद्दू बैल को देखकर मांजी ने कहा, “भैया! क्या अपने इस बैल पर मुझे बैठा लोगे?”
रलाभाई बोले, ” मांजी, मैं ज़रुर बैठा लूंगा। लेकिन इस थैले में मेरा धन भरा है। अगर बैल पर बैठे-बैठे आपने हवा नहीं निकालें, तो मैं आपको बैठने दूं।”
मांजी ने कहा, “भैया ! मुझे तुम्हारी बात मंजूर है।”
चलते-चलते पालीनाना आ पहुंचा और मांजी बैल पर से उतर पड़ी। रलाभाई ने कहा, “मांजी, जरा, ठहरिए। मुझे अपना धन देख लेने दीजिए।”
थैले में तो राख ही थी। देखने पर राख ही दिखाई पड़ी। रलाभाई ने कहा, “मांजी! इसमें तो राख है। क्या आपनें हवा निकाली?”
मांजी सच बोलनेवाली थीं। बेचारी बोलीं, “हां भैया! थोड़ी हवा निकाली तो थी।”
रलाभाई बोले, “तब तो मांजी! आपको अपना सब धन मुझको दे देना होगा।”
मांजी ने लाचार होकर अपना सारा धन दे दिया।
रलाभाई मांजी का धन लेकर घर लौटे। रात होते ही रलाभाई फिर रुपये खनखनाने बैठ गए।
लोगों ने पूछा, “रलाभाई! इतने रुपये तुम और कहां से ले आए !
रलाभाई ने कहा, “मेरे झोंपड़े की जो राख निकली थी, उसे मैंने बेचडाला। उसी के ये रूपय मिले हैं। मेरा कोई बड़ा घर तो था ही नहीं, जो मुझे ज्यादा रूपय मिलते, नहीं तो एक लाख रुपय मिल जाते।”
भायातों ने सोचा-‘आओं, हम सब भी वहीं करें, जो रलाभाई ने किया है। रलाभाई इतने मालदार बन जायं,तो भला हम क्यों पीछे रहें?’
भायातों ने जमा होकर अपने सारे घर जला डाले। इन घरों की राख के बड़े बड़े ढेर खड़े हो गए। भायात टोकनों में राख भर-भरकर उसे बेचने निकले बोलते चले-” लेनी है, किसी को राख? राख लेनी है?”
गांव के लोगों ने कहा, ” राख को तो तुम अपने सिरों पर ही मल लो भला इतनी राख कौन खरीदेगा?”
सब उदास चेहरे लेकर घर वापस आए। सबने कहा, ” इन रलाभाई तो हमें खूब ही ठगा!”
फिर रलाभाई ने अपने लिए बड़े-बड़े घर बनवाए। बहुत-सी भैंसे खरी ली। एक भैंसा भी पला लिया, और उसके गले में एक घण्टी लटका दी।
अब तो रलाभाई अपनी भैंसों के साथ भैसें को जगंल मे चराने ले जा और रास्ते-भर गाते जाते:
टन-टन घण्टी बजती है,
रलाभाई की भैंसे चरती हैं।.

कंजूस सेठ

एक थे सेठ और एक थी सेठानी। सेठानी खाने-पीने की बहुत शौक़ीन और चटोरी, थीं सेइ बड़ा कंजूस था। लेकिन सेठानी बड़ी चंट थी। जब सेठ घर में होते तो वह कम खाती और सेठ बाहर चले जाते, तो वह बढ़िया-बढ़िया खाना बनाकर खाया करती।
एक दिन सेठ के मन में शक पैदा हुआ। सेठने सोचा—‘मैं इतना सारा सामान घर में लाता रहता हूं, पर वह इतनी जल्दी ख़तम कैसे हो जाता है? पता तो लगाऊं कि कहीं सेठानी ही तो नहीं खा जाती?’
सेठ ने कहा, ‘‘पांच-सात दिन के लिए मुझे दूसरे गांव जाना है। मेरे लिए रास्ते का खाना तैयार कर दो।’’ सुनकर सेठानी खुश हो गई। झटपट खाना तैयार कर दिया और सेठ को बिदा किया। सेठ सारा दिन अपने एक मित्र के घर रहे। शाम को जब सेठानी मन्दिर में गई, तो सेठ चुपचाप घर में घुस गए और घर की एक बड़ी कोठी में छिपकर बैठ गए। रात हुई। सेठानी की तो खुशी का पार न था। सेठानी ने सोचा–‘अच्छा ही हुआ। अब पांच दिन मीठे-मीठे पकवान बनाकर भरपेट खाती रहूंगी।’
रात अपने पास सोने के लिए सेठानी पड़ोस की एक लड़की को बुला लाई। लड़की का नाम था, खेलती। भोजन करने के बाद दोनों सो गई। आधी रात बीतने पर सेठानी जागी। उन्होंने खेतली से पूछा:खेतली, खेतली,
रात कितनी?
खेतली बोली, ‘‘मां! अभी तो आधी रात हुई है।’’सेठानी ने कहा, ‘‘मुझको तो भूख लगी है। उधर उस कोने में गन्ने के सात टुकड़े पड़े है। उन्हें ले आओ। हम खा लें।’’ बाद में सेठानी ने और खेतली ने जी भरकर गन्ने खाए और फिर दोनों सो गई।अन्दर बैठे-बैठे सेठजी कोठी के छेद में से सबकुछ देखते रहे। उन्होंने सोचा—‘अरे, यह तो बहुत दुष्ट मालूम होती है।’
फिर जब दो बजे, तो सेठानी जागी और उन्होंने खेतली से पूछा:
खेतली, खेतली,
रात कितनी?
खेतली बोली, ‘‘मां, अभी दूसरा पहर हुआ है।’’
सेठानी ने कहा, ‘‘लेकिन मुझे तो बहुत ज़ोर की भूख लगी है। तुम छह-सात मठरी बना लो। आराम से खा लेंगे।’’
कोठी में बैठे सेठजी मन-ही-मन बड़-बड़ाए, ‘अरे, यह तो कमाल की शैतान लगती है!’
खेतली ने मठरी बनाई। दोनों ने मठरियां खाईं और फिर सो गईं।
जैसे ही चार बजे, सेठानी फिर जागी और बोली:
खेतली, खेतली,
रात कितनी?
खेतली बोली, ‘‘मां, अभी तो सबेरा होने में थोड़ी देर है।’’
सेठानी ने कहा, ‘‘बहन! मुझे तो बहुत भूख लगी है। थोड़ा हलुआ बना लो।’’ लड़की ने थोड़ा हलुआ बनाया। हलुए में खूब घी डाला। फिर दोनों ने हलुवा खाया और दोनों सो गईं। कोठी में बैठ-बैठे सेठजी दांत पीसने लगे। फिर ज्यों ही छह बजे, सेठानी उठ बैठी और बोली:
खेतली, खेतली!
रात कितनी?
खेतली ने कहा, ‘‘मां, बस, अब सबेरा होने को है।’’
सेठानी बोली, ‘‘मैं तो भूखी हूं। तुम थोड़ी खील भून लो। हम खील खा लें और पानी पी लें।’’
खेतली ने खील भून ली। दोनों ने खील खा लीं।
कोठी में बैठे सेठजी ने मन-ही-मन कहा—‘सबेरा होते ही है मैं इस सेठानी को देख लूंगा!’
खेतली अपने घर चली गई और सेठानी पानी भरने गई। इसी बीच सेठजी कोठी में से बाहर निकले, और गांव में गए। थोड़ी देर बाद हाथ में गठरी लेकर घर लौटे। सेठ को देखकर सेठानी सहम गई। उन्हें लगा, कैसे भी क्यों न हो, सेठ सबकुछ जान गए है।सेठानी ने पूछा, ‘‘आप तो पांच-सात दिन के लिए दूसरे गांव गए थे। फिर इतनी जल्दी क्यों लौट आए?’’
सेठ ने कहा, ‘‘रास्ते में मुझे अपशकुन हुआ, इसलिए वापस आ गया।’’
सेठानी ने पूछा, ‘‘ऐसा कौन-सा अपशकुन हुआ?’’
सेठ ने कहा, ‘‘एक बड़ा-सा सांप रास्ता काटकर निकल गया।’’
सेठानी ने कहा,‘‘हाय राम! सांप कितना बड़ा था?’’
सेठ बोले, ‘‘पूछती हो कि कितना बड़ा था? सुनो वह तो गन्ने के सात टुकड़ों के बराबर था।’’
सेठानी ने पूछा, ‘‘लेकिन उसका फन कितना बड़ा था?’’
सेठ ने कहा, ‘‘फन तो इतना बड़ा था, जितनी सात मठरियां होती हैं।’’
सेठानी ने पूछा, ‘‘वह सांप चल कैसे रहा था?’’
सेठ ने कहा, ‘‘बताऊं? जिस तरह हलुए में घी चलता था।’’
सेठानी ने पूछा, ‘‘क्या वह सांप उड़ता भी था?’’
सेठ ने कहा, ‘‘हां-हां जिस तरह तबे में खील उड़ती है, उसी तरह सांप भी उड़ रहा था।’’
सेठानी को शक हो गया कि सचमुच सेठ सारी बातें जान चुके हैं।
उसी दिन से सेठ ने अपनी कंजूसी छोड़ दी, और सेठानी ने अपना चटोरा-पन छोड़ा।

आनंदी कौआ

एक कौआ था। एक बार राजा ने उसे अपराधी ठहराया और अपने आदमियों से कहा, ‘‘जाओ, इस कौए को गांव के कुएं के किनारे के दलदल में रौंदकर मार डालो।’’ कौए को दलदल में डाल दिया। वह खुशी-खुशी गाने लगा:
दलदल में फिसलना सीखते हैं, भाई!
दलदल में फिसलना सीखते हैं।
राजा को और उसके आदमियों को यह देखकर अचम्भा हुआ कि दलदल में डाल देने के बाद दुखी होने के बदले कौआ आनन्द से गा रहा है। राजा को गुस्सा आया। उसने हुक्म दिया, ‘‘इसे कुएं में डाल दो, जिससे यह डूबकर मर जाय।’’
कौए को कुएं में डाल दिया गया। कौआ कुएं में पड़े-पड़े बोला:
कुएं में तैरना सीखते है, भाई!
कुएं में तैरना सीखते हैं।राजा ने कहा, ‘‘अब इसको इससे भी कड़ी सजा देनी चाहिए।’’
बाद में कौए को कांटों की एक बड़ी झाड़ी में डाल दिया गया। लेकिन कौआ तो वहां भी वैसे ही रहा। बड़ आनन्दी स्वर में गाते-गाते बोला:
कोमल कान छिदवा रहे है भाई!
कोमल कान छिदवा रहे हैं।राजा ने कहा, ‘‘कौआ तो बड़ा जबरदस्त है! दु:ख कैसा भी क्यों ने हो, यह तो दुखी होता ही नहीं। अब यह देखें कि सुख वाली जगह में रखने से दु:ख होता है या नही?’’ उन्होंने उसे तेल की एक कोठी में डलवा दिया।
कौए भाई के लिए तो यह भी मौज की जगह रही वह खुश होकर बोला:
कान में तेल डलवा रहे हैं, भाई!
कान में तेल डलवा रहे हैं।
इसके बाद राजा ने कौए को घी की नांद में डलवा दिया। नांद में पड़ा-पड़ा कौआ बोला:
घी के लोंदे खाता हूं, भाई!
घी के लोंदे खाता हूं।
राजा बहुत ही गुस्सा हुआ और उसने कौए को गुड़ की कोठी में डलवा दिया। कौए भाई मौज में आकर बोले:
गुड़ के चक्के खाते हैं, भाई!
गुड़ के चक्क खाते है।
राजा क्या करे! उसने अब कौए को झोपड़े पर फिकवा दिया। पर वहा बैठे-बैठे भी कौआ बोला:
खपरैल डालना सीखते है, भाई!
खपरैल डालना सीखते हैं।
आखिर राजा ने थकर कहा, ‘‘इस कौए को हम कोई सजा नहीं दे सकेंगे। यह तो किसी दु:ख को दु:ख मानता ही नहीं है। इसलिए अब इसे खुला छोड़ दो, उड़ा दो।’’ कौए को उड़ा दिया गया।
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